कीट पतंग पिपीलिका, मरकट भृंग मयूर।
जुगलबिहारी कीजिए, वृन्दावन की धूर॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (97)
चाहे कीड़ा, पतंगा, चींटी, बन्दर, भौंरा या मोर—जो भी देह मिले, मुझे स्वीकार है। बस, हे युगल-बिहारी! मुझे वृन्दावन की धूल (तुम्हारी चरण-रज) बना दीजिए—वहीं का कण बनकर रहूँ।
जुगलबिहारी कीजिए, वृन्दावन की धूर॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (97)
चाहे कीड़ा, पतंगा, चींटी, बन्दर, भौंरा या मोर—जो भी देह मिले, मुझे स्वीकार है। बस, हे युगल-बिहारी! मुझे वृन्दावन की धूल (तुम्हारी चरण-रज) बना दीजिए—वहीं का कण बनकर रहूँ।

