(राग नट नारायण)
गिरिधर पिय के हृदवसी तेरे बदन की परम सुदेस छबि ।
एक अंग के रूप के आग जात सखि ! कोटिसत चंद्रमा दवि॥ [1]
नैन अंस की सोभा वरनि सकै एसौ कौन कवि ?
'कुंभनदास' स्वामिनि राधिका ! इहै गति तोहि कों यों आइ फवि॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (163)
हे सखि! गिरिधर पिय के हृदय में बसने वाली श्री राधिका के बदन की छवि अत्यंत सुंदर है। उनके एक अंग की शोभा के सामने तो करोड़ों चंद्रमा-सूर्य भी फीके पड़ जाते हैं। [1]
उनकी नैनों एवं भुजाओं की शोभा का वर्णन भला कौन रसिक-कवि कर सकता है? श्री कुंभनदास कहते हैं — हे स्वामिनि राधिका! तुम्हारे इस सुंदर रूप-सौंदर्य की शोभा को निहारकर मन मोहित हो उठता है। [2]
गिरिधर पिय के हृदवसी तेरे बदन की परम सुदेस छबि ।
एक अंग के रूप के आग जात सखि ! कोटिसत चंद्रमा दवि॥ [1]
नैन अंस की सोभा वरनि सकै एसौ कौन कवि ?
'कुंभनदास' स्वामिनि राधिका ! इहै गति तोहि कों यों आइ फवि॥ [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (163)
हे सखि! गिरिधर पिय के हृदय में बसने वाली श्री राधिका के बदन की छवि अत्यंत सुंदर है। उनके एक अंग की शोभा के सामने तो करोड़ों चंद्रमा-सूर्य भी फीके पड़ जाते हैं। [1]
उनकी नैनों एवं भुजाओं की शोभा का वर्णन भला कौन रसिक-कवि कर सकता है? श्री कुंभनदास कहते हैं — हे स्वामिनि राधिका! तुम्हारे इस सुंदर रूप-सौंदर्य की शोभा को निहारकर मन मोहित हो उठता है। [2]

