कोऊ छत्र लीनै कोऊ छाहगीर कीनै कोऊ  - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (23)

कोऊ छत्र लीनै कोऊ छाहगीर कीनै कोऊ - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (23)

(कवित्त)
कोऊ छत्र लीनै कोऊ छाहगीर कीनै कोऊ,
बीनै ले प्रबीनै ये नवीनें सुर गावती । [1]
कोऊ जरी जोरै कर अतर गुलाब बोरै,
लै लै अलबेली हठी धावन तैं आवती ॥ [2]
कोऊ चौर ढारै कोऊ आरती उतारै कोऊ,
करती सलामें कोऊ मुजरा न पावतीं । [3]
बैठी आन तखत पै बखत बिलंद राधे,
बाला दिगपालन की माला पहिरावतीं ॥ [4]

- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (23)

कोई छत्र लेकर खड़ी है, कोई दर्पण लेकर खड़ी है, कोई वीणा लेकर मधुर संगीत गा रही है। [1]

कोई जरी का वस्त्र सजा रही है, कोई गुलाब और इत्र छिड़क रही है, और कोई उन अलबेली सरकार (श्री राधा) की सेवा में भागती हुई आ रही है। [2]

कोई चँवर ढुला रही है, कोई उनकी आरती उतार रही है, कोई उन्हें प्रणाम कर रही है तो कोई विनम्रता से झुककर अभिवादन प्रस्तुत कर रही है। [3]

श्रीराधा ऊँचे सिंहासन पर आकर विराजमान हैं, तथा देव रानियाँ उन्हें मालाएँ पहना रही हैं। [4]