नित्यविहार सों करि प्रीति - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (61)

नित्यविहार सों करि प्रीति - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (61)

(राग विभास)
नित्यबिहार सों करि प्रीति ।
संग रसिक अनन्य अनुसरि, भाव भक्ति प्रतीति ॥ [1]
ध्यान चित चिंता रहो नित्य, मानि रसिक की रीति ।
लाल रूप विलोकि दंपति, लखि जगत बिपरीति ॥ [2]

- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (61)

प्रिया-प्रियतम के नित्य-विहार रस से प्रीति करो क्योंकि वही अनन्य रसिक संतों का जीवन सार है। ऐसे अनन्य रसिकों के संग एवं दिखाए मार्ग के अनुसरण करने से भाव-भक्ति में दृढ़ प्रतीति (स्थिर निश्चय) सहज ही प्रकट हो जाती है। [1]

रसिकों की रसोपासना की रीति को दृढ़ता से धारण कर, अपना ध्यान, चित्त और चिंता हर समय उसी में लगाए रखो। श्री रूप सखी कहती हैं — जब नेत्रों एवं चिंतन में दंपति (राधा-कृष्ण) का अवलोकन होगा, तब यह संसार की समस्त दौड़-लगन तुच्छ प्रतीत होगी। [2]