नित बिहार बृंदावन राधा मोहन - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (637)

नित बिहार बृंदावन राधा मोहन - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (637)

(राग अलहिया बिलावल - इकताला)
नित बिहार बृंदावन राधा-मोहन करत रहैं ।
सहज रंगीले छैल छबीले हित-चित-लाह लहैं ॥ [1]
नित ब्रज नित व्यवहार नित नए तन मन पननि बहैं ।
नित ही हित झूमैं आनँदघन जमुना-तीर गहैं ॥ [2]

-  श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (637)

श्रीराधा और श्रीमोहन (श्रीकृष्ण) श्री धाम वृन्दावन में नित्य विहार करते रहते हैं। वे स्वभाव से ही सहज रंगीले, छैल-छबीले हैं, जो हृदय में प्रेम का संचार (आदान-प्रदान) करते रहते हैं । [1]

ब्रज नित्य नवीन है, यहाँ की प्रत्येक लीला नित्य नवीन है। तन, मन और प्रण सब उसी प्रेमरस में बहते रहते हैं। श्री आनन्दघन कहते हैं कि श्रीयुगल यमुना के किनारे, प्रेम में विभोर होकर, सहचरियों संग नित्य झूमते रहते हैं । [2]