साधो यह विचार मन जांचा है - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (49)

साधो यह विचार मन जांचा है - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (49)

(राग बरवा व कालंगड़ा)
साधो यह विचार मन जांचा है ॥ टेक ॥
प्रीत नहीं उनमें बिलकुल भी, जिन हरि से कुछ यांचा है।
विषय भोग सब फीके लागे, जिन हरि से मन रांचा है ॥ [1]
लोक लाज कुल कान तजे सोइ, दास हरि का सांचा है।
“रूपमाधुरी” इश्क हरि में, प्रेम मगन होय नांचा है ॥ [2]

- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (49)

हे साधकों! यह विचार मैंने मन ही मन बहुत बारीकी से परखा है — जिसने भी भगवान से कुछ माँगा है, उसमें बिल्कुल भी सच्चा प्रेम नहीं हो सकता। जिसका चित्त श्री हरि के प्रेम में वास्तविक रंगा होता है, उसे विषय-भोग तुच्छ लगते हैं। [1]

जो लोक-लाज और कुल-मर्यादा को त्याग देता है, वही श्री हरि का सच्चा दास है। श्री रूपमाधुरी कहते हैं — जो हरि-प्रेम में डूबा होता है, वह भाव में मग्न होकर प्रेमावेश में नाचता है। [2]