व्यास कुलीननि कोटि मिलि पंडित लाख पचीस - श्री हरिराम व्यास,  व्यास वाणी, साखी (16)

व्यास कुलीननि कोटि मिलि पंडित लाख पचीस - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (16)

व्यास कुलीननि कोटि मिलि, पंडित लाख पचीस।
स्वपच भक्तकी पानहीं, तुलै न तिनके सीस॥

- श्री हरिराम व्यास,  व्यास वाणी, साखी (16)

यदि करोड़ों उच्च कुलीन जन और लाखों-पचीस विद्वान पंडित भी एकत्र हो जाएँ, तो उन सभी के शीश एकत्र होकर भी उस वृंदावन के स्वपच की चरण-रज की बराबरी नहीं कर सकते जो यद्यपि अत्यंत नीच कुल में उत्पन्न हुआ है, परंतु भगवान का भक्त है ।