श्रीगुरु दीन दयाल जू यह अभिलाषा मोर - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (86.1)

श्रीगुरु दीन दयाल जू यह अभिलाषा मोर - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (86.1)

श्रीगुरु दीन दयाल जू, यह अभिलाषा मोर ।
जुगल चन्द पद कंज छबि, मन मलिन्द गत चोर ॥

- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (86.1)

हे दीनदयाल गुरुदेव! मेरी यह अभिलाषा है कि युगल-चन्द्र (राधा-कृष्ण) के चरण-कमलों की छवि मेरे मन रूपी भौंरे की गति को चुरा ले, अर्थात् मेरा मन सदा उन श्रीचरणों की मधुरता में ही निमग्न रहे।