नैनन के तारे दुलारे प्रान-प्यारे मेरे - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, विनय प्रेम पचासा (24)

नैनन के तारे दुलारे प्रान-प्यारे मेरे - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, विनय प्रेम पचासा (24)

(कवित्त)
नैनन के तारे दुलारे प्रान-प्यारे मेरे
दुख के दरन सुख-करन विसाल हैं। [1]
मेरो ध्यान मेरो ज्ञान मेरे वेद औ पुरान
विविध प्रमान मेरे एक नंदलाल हैं॥ [2]
'हरीचंद' और सों न काम सपनेहूँ मोहिं
मेरे सरवस धन जसुदा के वाल हैं। [3]
मेरी रति मेरी मति मेरे पति मेरे आन
मेरे जग माहिं सबै केवल गुपाल हैं ॥ [4]

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, विनय प्रेम पचासा (24)

मेरे नयनों के तारे, मेरे प्राणप्यारे नंदलाल ही मेरे सुख-दाता और दुख-हरने वाले हैं। [1]

वे ही मेरे ध्यान, ज्ञान, वेद, पुराण — सब प्रमाणों के आधार हैं। [2]

श्री हरिशचंद्र कहते हैं — मुझे स्वप्न में भी किसी और से कोई प्रयोजन नहीं, क्योंकि मेरा सर्वस्व धन केवल एक यशोदा लाल श्री कृष्ण ही हैं । [3]

वे ही मेरी रति, मति, पति (स्वामी) एवं मेरी मान-प्रतिष्ठा हैं — इस जगत में मेरे लिए सब कुछ केवल श्रीगोपाल हैं। [4]