(सवैया)
अब का समुझावती को समुझै, बदनामी के बीज तो बो चुकी री ।
तब तौ इतनौ न बिचार कयो, इहिँ जाल परे कहु को चुकी री॥ [1]
कहि ठाकुर या रस रीति रँगे, करि प्रीति पतिब्रत खो चुकी री ।
सखि नेकी बदी जो बदी हुती, भाल पै होनी हुती सु तो हो चुकी री॥ [2]
- श्री ठाकुर जी
एक सखी दूसरी से कहती है — अब तू क्या समझाएगी और कौन तुझे समझेगा? बदनामी का बीज तो तू पहले ही बो चुकी है। अब इतना सोच-विचार करने से क्या लाभ? जब स्वयं ही इस प्रेम-जाल में फँस गई है, तो अब दोष किसे देगी? [1]
जो भी एक बार बाँके बिहारी की प्रेम-रस की रीति में डूब जाता है, उसका लौकिक पतिव्रत-धर्म अपने आप छूट जाता है। हे सखि! जो कुछ होना था, वह तो तेरे भाग्य में पूर्व से ही लिखा था — अब जो होना था, वह हो चुका, इसलिए व्यर्थ चिंता छोड़ दे। [2]
अब का समुझावती को समुझै, बदनामी के बीज तो बो चुकी री ।
तब तौ इतनौ न बिचार कयो, इहिँ जाल परे कहु को चुकी री॥ [1]
कहि ठाकुर या रस रीति रँगे, करि प्रीति पतिब्रत खो चुकी री ।
सखि नेकी बदी जो बदी हुती, भाल पै होनी हुती सु तो हो चुकी री॥ [2]
- श्री ठाकुर जी
एक सखी दूसरी से कहती है — अब तू क्या समझाएगी और कौन तुझे समझेगा? बदनामी का बीज तो तू पहले ही बो चुकी है। अब इतना सोच-विचार करने से क्या लाभ? जब स्वयं ही इस प्रेम-जाल में फँस गई है, तो अब दोष किसे देगी? [1]
जो भी एक बार बाँके बिहारी की प्रेम-रस की रीति में डूब जाता है, उसका लौकिक पतिव्रत-धर्म अपने आप छूट जाता है। हे सखि! जो कुछ होना था, वह तो तेरे भाग्य में पूर्व से ही लिखा था — अब जो होना था, वह हो चुका, इसलिए व्यर्थ चिंता छोड़ दे। [2]

