(राग विहाग)
बसो मेरे नैननि में दोऊ लाल ।
स्याम बरन श्रीकुंजविहारी, गौर बिहारिन बाल ॥ [1]
नैननि निरखत रूपमाधुरी, उपजत सुख के जाल ।
श्रीराधाप्रसाद तृन तोरति, परसत प्रेम बिसाल ॥ [2]
- श्री राधा प्रसाद देव जू, श्री राधा प्रसाद देव जू की वाणी (26)
श्यामवर्ण श्रीकृष्ण कुंजबिहारी और गौरवर्ण श्रीराधा कुंजबिहारिणी — ये मेरे दोनों प्राणप्यारे मेरे नेत्रों में निरंतर बसे रहें। [1]
जब नेत्र इन दोनों की रूप-माधुरी का रसपान करते हैं, तो अनंत सुखों के समूह एकसाथ प्रकट हो जाते हैं। श्री राधाप्रसाद जी इस अगाध प्रेम में पूर्णतः निमग्न होकर हर क्षण बलिहारी जा रहे हैं, और कहीं इन पर दृष्टिदोष न आ जाए (नज़र न लगे), इस भावना से तिनके तोड़-तोड़कर फेंक रहे हैं। [2]
बसो मेरे नैननि में दोऊ लाल ।
स्याम बरन श्रीकुंजविहारी, गौर बिहारिन बाल ॥ [1]
नैननि निरखत रूपमाधुरी, उपजत सुख के जाल ।
श्रीराधाप्रसाद तृन तोरति, परसत प्रेम बिसाल ॥ [2]
- श्री राधा प्रसाद देव जू, श्री राधा प्रसाद देव जू की वाणी (26)
श्यामवर्ण श्रीकृष्ण कुंजबिहारी और गौरवर्ण श्रीराधा कुंजबिहारिणी — ये मेरे दोनों प्राणप्यारे मेरे नेत्रों में निरंतर बसे रहें। [1]
जब नेत्र इन दोनों की रूप-माधुरी का रसपान करते हैं, तो अनंत सुखों के समूह एकसाथ प्रकट हो जाते हैं। श्री राधाप्रसाद जी इस अगाध प्रेम में पूर्णतः निमग्न होकर हर क्षण बलिहारी जा रहे हैं, और कहीं इन पर दृष्टिदोष न आ जाए (नज़र न लगे), इस भावना से तिनके तोड़-तोड़कर फेंक रहे हैं। [2]

