डरै सदा चाहे न कछु सहै सबै हो होय - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (22)

डरै सदा चाहे न कछु सहै सबै हो होय - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (22)

डरै सदा चाहे न कछु, सहै सबै हो होय ।
रहै एक रस चाहि कै, प्रेम बखानो सोय॥

- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (22)

रसखान कहते हैं — जो इस भावना से डरता रहता है कि कहीं उसकी किसी चेष्टा से प्रियतम को कोई कष्ट न हो जाए, जो अपने प्रियतम से कोई भी कामना नहीं रखता, सब प्रकार की विपत्तियाँ सहकर भी जिसका प्रेम बढ़ता रहे, जो सदा एक प्रियतम के प्रेम-रस में डूबा रहता है — वही प्रेम, शुद्ध प्रेम कहलाता है।