धन धन वृन्दावन की लता प्यारी ।
फूले कदम माधुरी लपटी, कोयल बोलत कारी ॥ [1]
छहौ राग छत्तीस रागिनी, कुंज-कुंज उच्चारी ।
‘अभयराम’ रज वनकी महिमा, देखत हैं पियप्यारी ॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (01)
वृन्दावन की प्यारी-प्यारी लताएँ धन्य-धन्य हैं जो कदम के वृक्षों से लिपटी हुई मधुरता से खिल रही हैं, और जिनके ऊपर काली कोयलें मधुर स्वर में गान कर रही हैं। [1]
मानो हर कुंज में छह राग और छत्तीस रागिनियाँ गूंज रही हैं। श्री अभयराम कहते हैं कि श्रीधाम वृन्दावन की रज की महिमा ऐसी है कि उसे स्वयं प्रियतम-प्यारी (राधा-कृष्ण) निहारकर आनंदित होते हैं। [2]
फूले कदम माधुरी लपटी, कोयल बोलत कारी ॥ [1]
छहौ राग छत्तीस रागिनी, कुंज-कुंज उच्चारी ।
‘अभयराम’ रज वनकी महिमा, देखत हैं पियप्यारी ॥ [2]
- श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (01)
वृन्दावन की प्यारी-प्यारी लताएँ धन्य-धन्य हैं जो कदम के वृक्षों से लिपटी हुई मधुरता से खिल रही हैं, और जिनके ऊपर काली कोयलें मधुर स्वर में गान कर रही हैं। [1]
मानो हर कुंज में छह राग और छत्तीस रागिनियाँ गूंज रही हैं। श्री अभयराम कहते हैं कि श्रीधाम वृन्दावन की रज की महिमा ऐसी है कि उसे स्वयं प्रियतम-प्यारी (राधा-कृष्ण) निहारकर आनंदित होते हैं। [2]

