हम बालक तुम माय हमारी - श्री सहजो बाई

हम बालक तुम माय हमारी - श्री सहजो बाई

(राग भैरव)
हम बालक तुम माय हमारी, पल-पल माहिं करो रखवारी॥ [1]
निशिदिन गोदी ही में राखो, अन्वित वचन चितावन भाषो। [2]
विषय ओर जाने ना देवो, दुर-दुर जाऊं तो गहि लेवो॥ [3]
मैं अजान कछुहू नहि जानूं, बुरी-भली को ना पहिचानूं। [4]
जैसी तैसी तुमहीं चीन्हों, गुरु होय ध्यान खिलौना दीन्हों॥ [5]
तुम्हरी रक्षा ही सुं जीऊं, नाम तुम्हारौं अमृत पाऊं। [6]
दृष्टि तुम्हारी ऊपर मेरे, सदा रहूं मैं शरणै तेरे॥ [7]
मारी झिड़कौ तौ नहिं जाऊ, सरकि-सरकि तुमही पै आऊं। [8]
चरणदास कहै ‘सहजो’ दासी, हो रक्षक पूरण अविनाशी॥ [9]

- श्री सहजोबाई

हे गुरुदेव! मैं आपका बालक हूँ, और आप मेरी सच्ची माता हैं, जो प्रत्येक क्षण मेरी रक्षा करती हैं। [1]

मुझे सदा अपनी गोद में रखें, अपने प्रेम-भरे वचनों तथा कृपा-दृष्टि से मेरा पोषण करें। [2]

मुझे विषय-वासनाओं में भटकने न दें; यदि मैं भटक जाऊँ, तो कृपया अपनी ओर खींच लें। [3]

मैं अज्ञानी हूँ — मुझे यह नहीं पता कि क्या सही है और क्या गलत। [4]

मैं जैसी भी हूँ, वह केवल आप ही भली-भाँति जानते हैं; आपने ही मुझे ध्यान का रस पिलाया है। [5]

मैं इसलिए जीवित हूँ क्योंकि आप मेरी रक्षा करते हैं। मैं सदा आपके दिए गए नाम का अमृतपान करती रहूं। [6]

आपकी करुणामयी दृष्टि सदा मुझ पर बनी रहे, और मैं सदा आपकी शरण में रहूं। [7]

यदि आप मुझ पर क्रोध करें या मुझे दंड दें, तब भी मैं दूर नहीं जाऊँगीं; विनीत भाव से रेंगकर बार-बार आपके समीप आऊँगी। [8]

सहजोबाई अपने गुरुदेव चरणदास से कहती हैं — “मैं आपकी दासी हूँ, और आप ही मेरे रक्षक, सर्वसमर्थ, पूर्ण गुरुवर हैं।” [9]