(कवित्त)
कोऊ कहै अलख अनन्त पुनि कोऊ कहै,
कोऊ कहै ब्रह्म कोऊ जोति कौं बखानत हैं। [1]
कोऊ कहै गुनातीत सगुन कहत कोऊ,
कोऊ कोऊ अंध-धुंध आदि ही तें मानत हैं॥ [2]
कोऊ कहै शेष सिर पौढ्यौ सौ,
कोऊ महा तत्त्वनि गिनती उर आनत हैं। [3]
‘वृन्दावन हित’ रूप कुंजनि में क्रीडत,
हम तौ एक राधिकाई वल्लभ कौं जानत हैं॥ [4]
- श्री वृन्दावन दास जी
कोई उन्हें (भगवान) “अलख-अनन्त” कहता है, कोई उसे “ब्रह्म” या “जोति/प्रकाश” कहकर वर्णित करता है। [1]
कोई उसे निर्गुण बताता है, कोई सगुण; और कुछ लोग बिना तर्क-विचार या अनुभव के, बस परंपरा या आदिकालीन मान्यता से ही ईश्वर को मानते हैं। [2]
कोई कहता है कि वह शेषनाग के सिर पर स्थित है, कोई दार्शनिक तत्वों की गणना में ही मन लगाकर उसे समझना चाहता है। [3]
श्री हित वृन्दावन दास कहते हैं कि हमारे लिए वह परम तत्व वृन्दावन की सुन्दर कुंजों में क्रीड़ा करता है— हम केवल उन परम तत्त्व श्री राधिका वल्लभ को ही जानते हैं। [4]
कोऊ कहै अलख अनन्त पुनि कोऊ कहै,
कोऊ कहै ब्रह्म कोऊ जोति कौं बखानत हैं। [1]
कोऊ कहै गुनातीत सगुन कहत कोऊ,
कोऊ कोऊ अंध-धुंध आदि ही तें मानत हैं॥ [2]
कोऊ कहै शेष सिर पौढ्यौ सौ,
कोऊ महा तत्त्वनि गिनती उर आनत हैं। [3]
‘वृन्दावन हित’ रूप कुंजनि में क्रीडत,
हम तौ एक राधिकाई वल्लभ कौं जानत हैं॥ [4]
- श्री वृन्दावन दास जी
कोई उन्हें (भगवान) “अलख-अनन्त” कहता है, कोई उसे “ब्रह्म” या “जोति/प्रकाश” कहकर वर्णित करता है। [1]
कोई उसे निर्गुण बताता है, कोई सगुण; और कुछ लोग बिना तर्क-विचार या अनुभव के, बस परंपरा या आदिकालीन मान्यता से ही ईश्वर को मानते हैं। [2]
कोई कहता है कि वह शेषनाग के सिर पर स्थित है, कोई दार्शनिक तत्वों की गणना में ही मन लगाकर उसे समझना चाहता है। [3]
श्री हित वृन्दावन दास कहते हैं कि हमारे लिए वह परम तत्व वृन्दावन की सुन्दर कुंजों में क्रीड़ा करता है— हम केवल उन परम तत्त्व श्री राधिका वल्लभ को ही जानते हैं। [4]

