रस की नित नव उठत तरंग - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी (41)

रस की नित नव उठत तरंग - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी (41)

रस की नित नव उठत तरंग ।
हँसत खिलत लतिका-सी झूमत, काम कुसुम भरि अंग ॥ [1]
तुव तन स्रवत अमित अमृत-रस, पीबत नैन कुरंग ।
कान्त रसिक के प्राण किसोरी, स्याम किये रति रंग ॥ [2]

- श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, पद (41)

श्री धाम वृन्दावन में नित्य ही प्रेमरस की नई-नई तरंगें उठती रहती हैं। वहाँ प्रिया-प्रियतम की जोड़ी हँसती-खिलती लताओं की भाँति झूमती रहती है, जिनके अंग प्रेम के पुष्पों से भरे हुए हैं। [1]

उनके तन से अनंत अमृत-रस प्रवाहित होता है, जिसे हिरण जैसे नयन निरंतर पीते रहते हैं। यह गौर-श्यामल वर्ण की जोड़ी, जो श्री कान्त रसिक की प्राण-जीवन-धन है, प्रेम-रंग की वर्षा करती रहती है। [2]