आदि अंत वृन्दाविपिन, निरदोषिक करि बास - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (440)

आदि अंत वृन्दाविपिन, निरदोषिक करि बास - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (440)

आदि अंत वृन्दाविपिन, निरदोषिक करि बास ।
अद्भुत सुखद बिहार कों, देत तिन्हें हरिदास ॥

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (440)

सृष्टि की रचना से पूर्व और प्रलय के पश्चात भी जो सतत एकरस भूतल पर विद्यमान रहता है, वह केवल श्रीवृन्दावन धाम ही है। वहाँ जो जन समस्त अपराधों से रहित होकर अखंड वास करते हैं, उन पर अति प्रसन्न होकर श्रीस्वामी हरिदास जी महाराज उन्हें अति अद्भुत, सुखदायक और सर्वोपरि नित्य-विहार रस प्रदान कर देते हैं।