सोई रसिकअनन्य कहावै - श्री रूपरसिक देवाचार्य

सोई रसिकअनन्य कहावै - श्री रूपरसिक देवाचार्य

(राग-मारू)
सोई रसिकअनन्य कहावै ।
जिनको जुगल चरित्र बिना कछु, श्रवनन नाहीं और सुहावे ॥ [1]
याही रंग रंगिरहे रंगीले, तिनही को सँग भावै ।
अनुदिन रहस भावना भीने, नव-नव रुचिहिं बढ़ावै ॥ [2]
जो कोउ बाधक या वतियन में, तिनको संग छिटकावै ।
'रूपरसिक' अनुपम छबि लखि-लखि, पुलक न अंग समावै ॥ [3]

- श्री रूपरसिक देवाचार्य

वही वास्तविक रसिक अनन्य कहलाता है जिसके श्रवणेंद्रिय को युगल (श्री राधा कृष्ण) की रस लीलाओं के अतिरिक्त और कुछ भी सुनना अच्छा नहीं लगता। [1]

जो युगल के प्रेमरंग में ही रंगे हुए हैं, उन्हीं का संग उसे भाता है। वह प्रतिदिन गूढ़ भावना में भीगकर, नित्य नवीन ढंग से प्रेम का विकास करता है । [2]

जो कोई इस रस के मार्ग में बाधक हो, उससे वह अपने मन को दूर रखता है। श्री रूपरसिक कहते हैं कि श्री प्रिया-प्रियतम की अनुपम छवि को बार-बार निहारकर, उसका शरीर आनंद से पुलकित एवं रोमांचित होता रहता है। [3]