परमप्रेम, गुन, रूप अमित कवि को कहै ?
मीन, दीन जललीन, सु क्यों अंतहिं लहै ॥ [1]
लहे अंत न कोटि कल्पन सारदा मूक रहै ।
जीवन-कृपन की का चलै, विनु तव कृपा जो कछु कहै ॥ [2]
चरन-रति जो देहु स्वामिनि, जन्म कौ फल पाइए।
श्रीवंसीअलि ‘अलबेलि’ जीवन, सुजस तुम्हरो गाइए ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि
हे श्री राधे! तुम्हारे अगाध प्रेम, गुणों और सौंदर्य (रूप) का वर्णन कौन कवि कर सकता है? एक दीन मछली पानी में रहती है, भला वो अगाध सागर का अंत कैसे पा सकती है? [1]
उसका पार कोटि कल्पों में भी नहीं पाया जा सकता, अत: सरस्वती भी मौन रह जाती हैं। फिर मेरे जैसे असमर्थ जीव की क्या हैसियत, जो तुम्हारी कृपा के बिना तुम्हारे विषय में कुछ कह सकूँ। [2]
हे स्वामिनि, श्री राधा! यदि तुम अपने चरणों की निष्काम भक्ति मुझे प्रदान कर दो, तभी मैं अपने जीवन का सच्चा फल पाऊँगा। श्री अलबेली अलि कहते हैं कि श्री वंशीअलि का सर्वस्व जीवन धन, आपके सुंदर यश का गान करना है । [3]
मीन, दीन जललीन, सु क्यों अंतहिं लहै ॥ [1]
लहे अंत न कोटि कल्पन सारदा मूक रहै ।
जीवन-कृपन की का चलै, विनु तव कृपा जो कछु कहै ॥ [2]
चरन-रति जो देहु स्वामिनि, जन्म कौ फल पाइए।
श्रीवंसीअलि ‘अलबेलि’ जीवन, सुजस तुम्हरो गाइए ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि
हे श्री राधे! तुम्हारे अगाध प्रेम, गुणों और सौंदर्य (रूप) का वर्णन कौन कवि कर सकता है? एक दीन मछली पानी में रहती है, भला वो अगाध सागर का अंत कैसे पा सकती है? [1]
उसका पार कोटि कल्पों में भी नहीं पाया जा सकता, अत: सरस्वती भी मौन रह जाती हैं। फिर मेरे जैसे असमर्थ जीव की क्या हैसियत, जो तुम्हारी कृपा के बिना तुम्हारे विषय में कुछ कह सकूँ। [2]
हे स्वामिनि, श्री राधा! यदि तुम अपने चरणों की निष्काम भक्ति मुझे प्रदान कर दो, तभी मैं अपने जीवन का सच्चा फल पाऊँगा। श्री अलबेली अलि कहते हैं कि श्री वंशीअलि का सर्वस्व जीवन धन, आपके सुंदर यश का गान करना है । [3]

