जानीजू अब जानी श्रीवन - श्री ललित माधुरी

जानीजू अब जानी श्रीवन - श्री ललित माधुरी

(राग जिला)
जानीजू अब जानी श्रीवन, देहौ वास विहारिनिरानी।
अन करनी जो वनी दासि सों, सो करनी निज हिये न आनी ॥ [1]
दरसाई छवि ललितकिशोरी, भुज गल मेलि श्याम सुखदानी।
ऐसी कौन कृपा की सागर, ऐसिहु पतित सुखद रस सानी॥ [2]

- श्री ललित माधुरी

अब मुझे श्रीवृन्दावन जाना है। हे वृन्दावन की रानी! मुझे भलीभाँति ज्ञात है कि केवल आप ही मुझे वृन्दावन-वास प्रदान कर सकती हैं। मुझ पर अब कृपा करके श्रीधाम वृन्दावन का वास दें। यदि मैंने, आपकी दासी ने, कभी भी आपकी इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य किया हो, तो कृपया उसे अपने हृदय में स्थान न दें। [1]

हे ललित किशोरी! कृपया मुझे अपना वह दिव्य स्वरूप दिखाएँ, जिसमें आप अपनी भुजाएँ श्यामसुन्दर के गले में डालकर उन्हें आलिंगनबद्ध किए खड़ी हैं। आप जैसी करुणा की सागर कौन हो सकती है? मेरे जैसे पतित को ऐसा दिव्य रस प्रदान करने वाली, आपके अतिरिक्त और कौन हो सकती हैं, हे स्वामिनी? [2]