तज शेष खगेश को दौड़ते जो - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

तज शेष खगेश को दौड़ते जो - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

(सवैया)
तज शेष खगेश को दौड़ते जो, सुनते यदि स्वप्न में आह दुखी की । 
छिलके विदुरानी के प्यारे लगे, मृदु मेवा तजी कुजराज सुखी की ॥ [1]
हरेकृष्ण! का भाग्य न चेता अभी, हद भी कुछ होती है बेरुखी की । 
चतुरानन चाह करें जिनकी, करते वह चाकरी चन्द्रमुखी की ॥ [2]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

यदि स्वप्न में भी कोई दुखी जीव आह भरकर उन्हें पुकारता है, तो वे (श्रीकृष्ण) शेषनाग और गरुड़ आदि को भी त्यागकर उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं। जिन्हें दुर्योधन जैसे राजभोजों के मिष्ठान छोड़, विदुरानी के प्रेम से दिए केले के छिलके प्रिय लगे। [1]

श्री हरेकृष्ण जी कहते हैं — क्या तेरा विवेक अब भी नहीं जागा? हद है कि तू ऐसे कृपालु ठाकुर से अभी भी बेरुख़ी किए बैठा है। जिनकी स्वयं ब्रह्मा भी सेवा करने को तरसते हैं, उन्हें चन्द्रमुखी श्री राधा जू की दासता ही सबसे प्रिय लगती है। [2]