(राग बिभास-ताल तिताला)
हमपर कब कृपालु हरि हुइहौ ॥
मैं अधमिन तुम अधम-उधारन, कैसे प्रन न निबइहौ ।
कोटिन खल प्रभु तुमने तारे, दीन जान का मोहि लजइहौ ॥ [1]
मैं सरनागत नाथ तिहारी, दास जान किन आस पुजइहौ ।
का कहिहै जग लोक नाथ, जब रूपकुँवरिकी सुध बिसरइहौ ॥ [2]
- रूप कुँवरि जी
हे हरि! हम पर कब कृपा करोगे? मैं तो अत्यन्त अधम हूँ, और आप अधमों के उद्धारक— फिर अपनी प्रतिज्ञा कैसे न निभाओगे? हे प्रभु! आपने करोड़ों दुष्टों को तार दिया, तो मुझे दीन जानकर यूँ तारने में संकोच क्यों कर रहे हो? [1]
मैं आपकी शरण में हूँ, नाथ। मुझे अपनी दास मानकर मेरी आशा पूरी कीजिए। हे जगन्नाथ, जब रूपकुँवरी की सुध बिसरा दोगे, तब संसार क्या कहेगा? [2]
हमपर कब कृपालु हरि हुइहौ ॥
मैं अधमिन तुम अधम-उधारन, कैसे प्रन न निबइहौ ।
कोटिन खल प्रभु तुमने तारे, दीन जान का मोहि लजइहौ ॥ [1]
मैं सरनागत नाथ तिहारी, दास जान किन आस पुजइहौ ।
का कहिहै जग लोक नाथ, जब रूपकुँवरिकी सुध बिसरइहौ ॥ [2]
- रूप कुँवरि जी
हे हरि! हम पर कब कृपा करोगे? मैं तो अत्यन्त अधम हूँ, और आप अधमों के उद्धारक— फिर अपनी प्रतिज्ञा कैसे न निभाओगे? हे प्रभु! आपने करोड़ों दुष्टों को तार दिया, तो मुझे दीन जानकर यूँ तारने में संकोच क्यों कर रहे हो? [1]
मैं आपकी शरण में हूँ, नाथ। मुझे अपनी दास मानकर मेरी आशा पूरी कीजिए। हे जगन्नाथ, जब रूपकुँवरी की सुध बिसरा दोगे, तब संसार क्या कहेगा? [2]

