सुनि मन मधुकर ज्ञान सिखाऊँ ।
चरन कमल रति रुचि उपजाऊँ ॥ [1]
तिहि पथ चलौ जु बहुरि न आऊँ ।
जनम मरन भै भर्म भुलाऊँ ॥ [2]
बसि वृन्दावन उत्तम ठाँऊँ ।
सतसंगति परमार्थ पाऊँ ॥ [3]
नित दंपति संपतिहि दिखाऊँ।
श्रीबिहारिनिदासि भई गुन गाऊँ॥ [4]
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (40)
हे मन रूपी भँवरे! तू ठौर-ठौर पर डोल रहा है, अब मेरी बात सुन। मैं तुझे ऐसा ज्ञान दूँगा जिससे तेरी रुचि श्री चरण-कमलों में उत्पन्न होगी और तू अगाध सुख को प्राप्त करेगा। [1]
जिस मार्ग पर चलने से तुझे फिर इस संसार में लौटना नहीं पड़ेगा, और जन्म, मृत्यु, भय, भ्रम तथा दुख से सदा के लिए मुक्ति मिल जाएगी। [2]
मानो मन यह पूछता है कि वह कौन-सी बात है, तो श्री बिहारिनदेव उत्तर देते हैं—तू सदा सर्वोपरि श्रीधाम वृंदावन में अखंड वास कर, जिससे तुझे सहज ही रसिकों का संग प्राप्त होगा। [3]
वहाँ तुझे नित्य बिहारी-बिहारिणी जू के दर्शन रूपी सुख-संपत्ति सहज ही प्राप्त होगी, और तब तू उनके श्री चरण कमलों के सौंदर्य को निरंतर पान कर, उमंग से उनके गुणों का गान करेगा। [4]
चरन कमल रति रुचि उपजाऊँ ॥ [1]
तिहि पथ चलौ जु बहुरि न आऊँ ।
जनम मरन भै भर्म भुलाऊँ ॥ [2]
बसि वृन्दावन उत्तम ठाँऊँ ।
सतसंगति परमार्थ पाऊँ ॥ [3]
नित दंपति संपतिहि दिखाऊँ।
श्रीबिहारिनिदासि भई गुन गाऊँ॥ [4]
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (40)
हे मन रूपी भँवरे! तू ठौर-ठौर पर डोल रहा है, अब मेरी बात सुन। मैं तुझे ऐसा ज्ञान दूँगा जिससे तेरी रुचि श्री चरण-कमलों में उत्पन्न होगी और तू अगाध सुख को प्राप्त करेगा। [1]
जिस मार्ग पर चलने से तुझे फिर इस संसार में लौटना नहीं पड़ेगा, और जन्म, मृत्यु, भय, भ्रम तथा दुख से सदा के लिए मुक्ति मिल जाएगी। [2]
मानो मन यह पूछता है कि वह कौन-सी बात है, तो श्री बिहारिनदेव उत्तर देते हैं—तू सदा सर्वोपरि श्रीधाम वृंदावन में अखंड वास कर, जिससे तुझे सहज ही रसिकों का संग प्राप्त होगा। [3]
वहाँ तुझे नित्य बिहारी-बिहारिणी जू के दर्शन रूपी सुख-संपत्ति सहज ही प्राप्त होगी, और तब तू उनके श्री चरण कमलों के सौंदर्य को निरंतर पान कर, उमंग से उनके गुणों का गान करेगा। [4]

