भजनी क्यों डरिहै उपहासहि ।
अपनी वस्तु नौहरी काजै, सहै जगत के त्रासहिः ॥ [1]
सुहृद सनेही अपनी अपनी, आतम मान करहु वस वासहि ।
बेपरवाही व्यास सुवन कौ, बल है नागरीदासहि ॥ [2]
- श्री नेह नागरी दास, श्री नेह नागरी दास जी की वाणी
भजन करने वाला व्यक्ति संसार के उपहास या आलोचना से क्यों डरे? वह तो अपनी वस्तु (भगवत्प्रेम/भगवद्प्राप्ति) के लिए सब सहता है। इसलिए यदि उसे लोकनिंदा और त्रास सहना भी पड़े, तो वह चिंता नहीं करता और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहता है। [1]
संसार में सभी, चाहे मित्र हों या संबंधी, अपने-अपने दृष्टिकोण से सोचते हैं। अतः किसी की परवाह न करते हुए, अपने आत्मकल्याण के लिए विचार करना चाहिए और श्रीधाम वृन्दावन में वास करना चाहिए। श्री नागरीदास कहते हैं कि उनका बल तो श्री व्यास सुवान, अर्थात श्री हित हरिवंश महाप्रभु हैं, जिनके भरोसे वे सदा बेपरवाह रहते हैं। [2]
अपनी वस्तु नौहरी काजै, सहै जगत के त्रासहिः ॥ [1]
सुहृद सनेही अपनी अपनी, आतम मान करहु वस वासहि ।
बेपरवाही व्यास सुवन कौ, बल है नागरीदासहि ॥ [2]
- श्री नेह नागरी दास, श्री नेह नागरी दास जी की वाणी
भजन करने वाला व्यक्ति संसार के उपहास या आलोचना से क्यों डरे? वह तो अपनी वस्तु (भगवत्प्रेम/भगवद्प्राप्ति) के लिए सब सहता है। इसलिए यदि उसे लोकनिंदा और त्रास सहना भी पड़े, तो वह चिंता नहीं करता और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहता है। [1]
संसार में सभी, चाहे मित्र हों या संबंधी, अपने-अपने दृष्टिकोण से सोचते हैं। अतः किसी की परवाह न करते हुए, अपने आत्मकल्याण के लिए विचार करना चाहिए और श्रीधाम वृन्दावन में वास करना चाहिए। श्री नागरीदास कहते हैं कि उनका बल तो श्री व्यास सुवान, अर्थात श्री हित हरिवंश महाप्रभु हैं, जिनके भरोसे वे सदा बेपरवाह रहते हैं। [2]

