अग्र आलकस जनि करो, हरि भजिबे के हेत - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

अग्र आलकस जनि करो, हरि भजिबे के हेत - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

अग्र आलकस जनि करो, हरि भजिबे के हेत।
बहुत गई थोड़ी रही, थोड़े में हूँ चेत॥

- श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

श्री अग्रदास कहते हैं कि श्री हरि के भजन में आलस्य मत करो। जीवन का बहुत समय बीत चुका है, अब थोड़ा ही बचा है — उसी थोड़े में सावधान हो जाओ और अपनी बिगड़ी बात बना लो।