दोऊ कानन लगि कहैं चुंबन देहिं अँकोर - श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (16)

दोऊ कानन लगि कहैं चुंबन देहिं अँकोर - श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (16)

दोऊ कानन लगि कहैं, चुंबन देहिं अँकोर।
अबकै मोहिं जिताब सखि, लेहुँ बलैयाँ तोर ॥

- श्री भगवत रसिक जी, श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (16)

(नित्यविहार-रत श्यामाश्याम की परिचर्या में अवस्थित श्रीभगवतअलि जी कहती हैं कि नित्यविहार की स्थिति में अधीर हुए) प्रिया-प्रियतम मेरे कानों से लग-लगकर और अँकोर के रूप में चुंबन का प्रसाद दे-देकर कह रहे हैं कि "हे प्यारी सखी, मैं तुझ पर बलिहारी हूँ। तू जैसे भी हो, इस बार तो मुझे जिता ही दे !"