जयति जय जयति ललितादि वर भामिनी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

जयति जय जयति ललितादि वर भामिनी - श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

श्री वृन्दावन की धूली। परम सुमंगल मूली ॥ [1]
जेहि मुनिजन ध्यान लगावै । ब्रह्मादिक छुवन न पावै ॥ [2]
जो आलिन पद आराधै । सो पावै बिना उपाधै ॥ [3]
जो अपना शीश चढावै । अरु वृन्दावन जस गावै॥ [4]
जब कृपा करें श्रीराधा। सब पूरें मन की साधा॥ [5]
उद्धवादि शिरधारी। शुक मुनि मुखहि उचारी॥ [6]
जेहि आगम निगम पुकारै। सब रिधि सिधि तापै वारै॥ [7]
कहलों कहों वखानी। महिमा कोउ न जानी॥ [8]
श्री रामसखी मन दीन्हो। निज अंग अंग भूषण कीन्हो ॥ [9]

- श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी

श्रीवृंदावन की रज परम शुभता का मूल है।  [1]

जिस रज का ध्यान मुनिजन लगाते हैं,जिसका स्पर्श ब्रह्मा आदि के लिए भी परम दुर्लभ है। [2]

जो सहचरियाँ श्री राधा रानी के चरणों की आराधना करती है, केवल वह ही, बिना किसी बाधा के उस रज को प्राप्त करती हैं। [3]

जो अपना सर्वसमर्पण कर, वृंदावन का यश गाता है, वह धन्य हो जाता है। [4]

जब श्रीराधा कृपा करती हैं, तब ही मन की समस्त साधनाएँ पूर्ण होती हैं। [5]

जिस रज को उद्धव आदि शीश पर धारण करते हैं; शुकादि मुनि उसके गुणों का मुख से उच्चारण करते हैं। [6]

जिसकी महिमा शास्त्र एवं वेद भी करते हैं, जिस पर समस्त रिद्धियों–सिद्धियों का बलिदान किया जा सकता है । [7]

उस वृन्दावन धाम की रज की महिमा का कहाँ तक बखान किया जाए। उसकी महिमा को कोपूर्ण रूप से कोई नहीं जान नहीं सकता। [8]

श्री रामसखी कहती हैं, उन्होनें अपने मन को वृंदावन रज को समर्पित कर दिया है एवं उसे अपने अंग-अंग का भूषण बना लिया है । [9]