हरि, तेरौ भजन कियौ न जाइ ।
कह करौ, तेरी प्रबल माया देति मन भरमाइ॥ [1]
जवै आवौ, साधु-संगति कछुक मन ठहराइ ।
ज्यौ गयंद अन्हाइ सरिता, बहुरि वहै सुभाइ॥ [2]
वेष धरि धरि हरयौ पर-धन, साधु-साधु कहाइ ।
जैसे नटवा लोभ-कारन, करत स्वाँग बनाइ॥ [3]
करौ जतन, न भजौ, तुमकौं, कछुक मन उपजाइ ।
सूर प्रभु की सबल माया, देति मोहि भुलाइ॥ [4]
- श्री सूरदास, सूर सागर
हे भगवान् श्री हरि! आपका भजन किया ही नहीं जाता, क्या करूँ? आपकी प्रबल माया मेरे मन को बार-बार भ्रमित कर देती है। [1]
जब मैं संतों का संग करता हूँ, तो सत्संग के प्रभाव से मन कुछ समय के लिए स्थिर होता है, परंतु शीघ्र ही वही पुरानी चंचलता लौट आती है — जैसे गजेंद्र नदी में स्नान करके फिर अपने ही शरीर पर सूँड से धूल डाल लेता है। [2]
संतों जैसा वेश धारण करके भी मैं केवल नाम का साधु रहा — भीतर से कपटपूर्ण रहा, और दूसरों का धन उसी प्रकार लूटा, जैसे कोई नट केवल धन के लिए स्वांग रचकर अभिनय करता है। [3]
हे प्रभु! मैं भजन करने को तत्पर तो होता हूँ, पर जैसे ही भजन करने बैठता हूँ, मेरे मन में सांसारिक भाव उत्पन्न हो जाते हैं। श्री सूरदास कहते हैं — हे प्रभु! आपकी माया अत्यंत बलवती है, जो मुझे हर बार भ्रम में डाल देती है। [4]
कह करौ, तेरी प्रबल माया देति मन भरमाइ॥ [1]
जवै आवौ, साधु-संगति कछुक मन ठहराइ ।
ज्यौ गयंद अन्हाइ सरिता, बहुरि वहै सुभाइ॥ [2]
वेष धरि धरि हरयौ पर-धन, साधु-साधु कहाइ ।
जैसे नटवा लोभ-कारन, करत स्वाँग बनाइ॥ [3]
करौ जतन, न भजौ, तुमकौं, कछुक मन उपजाइ ।
सूर प्रभु की सबल माया, देति मोहि भुलाइ॥ [4]
- श्री सूरदास, सूर सागर
हे भगवान् श्री हरि! आपका भजन किया ही नहीं जाता, क्या करूँ? आपकी प्रबल माया मेरे मन को बार-बार भ्रमित कर देती है। [1]
जब मैं संतों का संग करता हूँ, तो सत्संग के प्रभाव से मन कुछ समय के लिए स्थिर होता है, परंतु शीघ्र ही वही पुरानी चंचलता लौट आती है — जैसे गजेंद्र नदी में स्नान करके फिर अपने ही शरीर पर सूँड से धूल डाल लेता है। [2]
संतों जैसा वेश धारण करके भी मैं केवल नाम का साधु रहा — भीतर से कपटपूर्ण रहा, और दूसरों का धन उसी प्रकार लूटा, जैसे कोई नट केवल धन के लिए स्वांग रचकर अभिनय करता है। [3]
हे प्रभु! मैं भजन करने को तत्पर तो होता हूँ, पर जैसे ही भजन करने बैठता हूँ, मेरे मन में सांसारिक भाव उत्पन्न हो जाते हैं। श्री सूरदास कहते हैं — हे प्रभु! आपकी माया अत्यंत बलवती है, जो मुझे हर बार भ्रम में डाल देती है। [4]

