(सवैया)
मन में बसी बस चाह यही, पिय नाम तुम्हारा उचारा करूँ।
बिठला के तुम्हे मन मंदिर में, मन मोहिनी रूप निहारा करूँ॥ [1]
भर के दृग पात्र में प्रेम का जल, पद पंकज नाथ पखारा करुँ।
बन प्रेम पुजारी तुम्हारा प्रभु, नित आरती भव्य उतारा करूँ॥ [2]
- ब्रज के सवैया
हे राधा कृष्ण! अब मेरे मन में बस यही चाह है कि मैं दिन-रात तुम्हारा ही नाम लेता रहूँ। अपने मन रूपी मंदिर में तुमको बिठलाकर, तुम्हारा मनमोहक रूप निहारा करूँ । [1]
नेत्रों के पात्र में प्रेमाश्रुओं का जल भर कर, आपके चरण कमलों को नित्य धोया करूँ । आपका प्रेम पुजारी बन कर आपकी सदा आरती उतारा करूँ । [2]
मन में बसी बस चाह यही, पिय नाम तुम्हारा उचारा करूँ।
बिठला के तुम्हे मन मंदिर में, मन मोहिनी रूप निहारा करूँ॥ [1]
भर के दृग पात्र में प्रेम का जल, पद पंकज नाथ पखारा करुँ।
बन प्रेम पुजारी तुम्हारा प्रभु, नित आरती भव्य उतारा करूँ॥ [2]
- ब्रज के सवैया
हे राधा कृष्ण! अब मेरे मन में बस यही चाह है कि मैं दिन-रात तुम्हारा ही नाम लेता रहूँ। अपने मन रूपी मंदिर में तुमको बिठलाकर, तुम्हारा मनमोहक रूप निहारा करूँ । [1]
नेत्रों के पात्र में प्रेमाश्रुओं का जल भर कर, आपके चरण कमलों को नित्य धोया करूँ । आपका प्रेम पुजारी बन कर आपकी सदा आरती उतारा करूँ । [2]

