(कवित्त)
कोऊ फिरै नाँगे पाइ कोऊ गुदरी बनाइ,
देह की दशा दिखाइ, आइ लोग घूट्यौ है। [1]
कोऊ दूधाधारी होइ कोऊ फलाहारी तोय,
कोऊ अधौमुख झूलि झूलि घूम घूट्यौ है॥ [2]
कोऊ नहिं पाहिं लौन कोऊ मुख गहै मौन,
‘सुन्दर’ कहत योंहीं वृथा भुस कूट्यौ है। [3]
प्रभु सौं न प्रीति माहिं ज्ञान सौं परचै नाहिं,
देखौ भाई आँधरनि ज्यौं बजार लूट्यौ है ॥ [4]
- श्री सुंदरदास जी
कोई नंगे पाँव फिरता है, कोई फटे कपड़े पहनता है, वे अपने शरीर को कष्ट देकर केवल अपना वैराग्य दिखाना चाहते हैं। [1]
कुछ केवल दूध पर रहते हैं, कुछ केवल फलों पर; कुछ उल्टे लटक कर तप करते हैं और सोचते हैं कि ऐसा करने से भगवान मिल जाएँगे। [2]
कुछ नमक छोड़ देते हैं, कुछ मौन व्रत धारण कर लेते हैं। श्री सुन्दरदास कहते हैं कि यह सब व्यर्थ है — जैसे बिना दाने के भूसे को कूटने से क्या लाभ? [3]
जब प्रभु से प्रेम ही नहीं है, और न सच्चे ज्ञान का परिचय है— तो यह सब अंधे के द्वारा बाज़ार लूटने जैसा व्यर्थ प्रयास है। [4]
कोऊ फिरै नाँगे पाइ कोऊ गुदरी बनाइ,
देह की दशा दिखाइ, आइ लोग घूट्यौ है। [1]
कोऊ दूधाधारी होइ कोऊ फलाहारी तोय,
कोऊ अधौमुख झूलि झूलि घूम घूट्यौ है॥ [2]
कोऊ नहिं पाहिं लौन कोऊ मुख गहै मौन,
‘सुन्दर’ कहत योंहीं वृथा भुस कूट्यौ है। [3]
प्रभु सौं न प्रीति माहिं ज्ञान सौं परचै नाहिं,
देखौ भाई आँधरनि ज्यौं बजार लूट्यौ है ॥ [4]
- श्री सुंदरदास जी
कोई नंगे पाँव फिरता है, कोई फटे कपड़े पहनता है, वे अपने शरीर को कष्ट देकर केवल अपना वैराग्य दिखाना चाहते हैं। [1]
कुछ केवल दूध पर रहते हैं, कुछ केवल फलों पर; कुछ उल्टे लटक कर तप करते हैं और सोचते हैं कि ऐसा करने से भगवान मिल जाएँगे। [2]
कुछ नमक छोड़ देते हैं, कुछ मौन व्रत धारण कर लेते हैं। श्री सुन्दरदास कहते हैं कि यह सब व्यर्थ है — जैसे बिना दाने के भूसे को कूटने से क्या लाभ? [3]
जब प्रभु से प्रेम ही नहीं है, और न सच्चे ज्ञान का परिचय है— तो यह सब अंधे के द्वारा बाज़ार लूटने जैसा व्यर्थ प्रयास है। [4]

