कहों कहां लों वरनि में वंशीवट की केलि - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (297)

कहों कहां लों वरनि में वंशीवट की केलि - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (297)

कहों कहां लों वरनि में, वंशीवट की केलि ।
वा सुख में समझे सोई, जे निज संग सहेलि ॥

- श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (297)

मैं प्रिया-प्रियतम की वंशीवट की उस अद्भुत दिव्य केली लीला को कैसे और कहाँ तक वर्णन करूँ क्योंकि उस रस को वही समझ सकता है जो स्वयं सहचरियों के संग उस लीला-रस में सहभागी होता है।