रास-रस रसिक रँगीली राधा।
जा पद-नख-मणि-चंद्र चंद्रिकहिं, शंभु समाधिहिं साधा॥ [1]
बिके श्याम बिनु दाम याम-वसु, जासु नाम आराधा।
जासु विरह विरहातुर हरिहूँ, रहि न सकत पल आधा॥ [2]
नित्य विहार करति वृंदावन, कुंजनि प्रेम अगाधा।
किमि 'कृपालु' तहँ रहि सक सपनेहुँ, भुक्ति मुक्ति दुइ बाधा॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा माधुरी (35)
श्री किशोरी जी रास रस से विभोर रसिकों को रिझाने वाली हैं, जिनके चरण कमलों की नखमणि रूपी चन्द्रमा के प्रकाश को ब्रह्म जान कर योगीराज शम्भु सरीखे समाधि में ध्यान करते हुए निर्विकल्प रहते हैं। [1]
जिनके नाम की आराधना बिना दाम के बिके हुए, श्यामसुन्दर भी आठों याम किया करते हैं। जिनके विरह में विरही बनकर भगवान् भी आधे पल के लिए भी चैन नहीं पाते। [2]
जो अगाध प्रेम को धारण किये हुए वृन्दावन की कुंजों में नित्य विहार किया करती हैं। जगद्गुरु श्री कृपालु जी कहते हैं जिनके कृपा कटाक्ष को पा लेने पर स्वप्न में भी ब्रह्मलोक पर्यन्त के सुख एवं एकत्व मुक्ति अपना प्रभाव नहीं डाल सकते। [3]
जा पद-नख-मणि-चंद्र चंद्रिकहिं, शंभु समाधिहिं साधा॥ [1]
बिके श्याम बिनु दाम याम-वसु, जासु नाम आराधा।
जासु विरह विरहातुर हरिहूँ, रहि न सकत पल आधा॥ [2]
नित्य विहार करति वृंदावन, कुंजनि प्रेम अगाधा।
किमि 'कृपालु' तहँ रहि सक सपनेहुँ, भुक्ति मुक्ति दुइ बाधा॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा माधुरी (35)
श्री किशोरी जी रास रस से विभोर रसिकों को रिझाने वाली हैं, जिनके चरण कमलों की नखमणि रूपी चन्द्रमा के प्रकाश को ब्रह्म जान कर योगीराज शम्भु सरीखे समाधि में ध्यान करते हुए निर्विकल्प रहते हैं। [1]
जिनके नाम की आराधना बिना दाम के बिके हुए, श्यामसुन्दर भी आठों याम किया करते हैं। जिनके विरह में विरही बनकर भगवान् भी आधे पल के लिए भी चैन नहीं पाते। [2]
जो अगाध प्रेम को धारण किये हुए वृन्दावन की कुंजों में नित्य विहार किया करती हैं। जगद्गुरु श्री कृपालु जी कहते हैं जिनके कृपा कटाक्ष को पा लेने पर स्वप्न में भी ब्रह्मलोक पर्यन्त के सुख एवं एकत्व मुक्ति अपना प्रभाव नहीं डाल सकते। [3]

