जौं हमरे दोसन लखौ, तौ नहिं कछु अवलंब ।
अपुनी दीन-दयालता, केवल दखहु अंब॥
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (20)
हे प्रभु! यदि आप मेरे दोषों को ही निहारेंगे, तो फिर मेरे पास कोई भी अवलम्ब नहीं बचेगा। मेरी विनती है कि आप अपने उस स्वभाव की ओर दृष्टि करें, जो दीनों पर करुणा करने वाला है। केवल उसी कृपालु स्वभाव के कारण ही मेरे जैसे पापी का कल्याण संभव है।
अपुनी दीन-दयालता, केवल दखहु अंब॥
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (20)
हे प्रभु! यदि आप मेरे दोषों को ही निहारेंगे, तो फिर मेरे पास कोई भी अवलम्ब नहीं बचेगा। मेरी विनती है कि आप अपने उस स्वभाव की ओर दृष्टि करें, जो दीनों पर करुणा करने वाला है। केवल उसी कृपालु स्वभाव के कारण ही मेरे जैसे पापी का कल्याण संभव है।

