(राग सारंग)
बेंनी गूँथि कहा कोउ जानें मेरी सी तेरी सौं ।
बिच बिच फूल सेत पीत राते को करि सकै एरी सौं ॥ [1]
बैठे रसिक सँवारनि बारनि कोमल कर ककही सौं ।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा नखसिख लोँ बनाई दे काजर नख ही सौं ॥ [2]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (70)
आज श्रीलाल (श्रीकृष्ण) की प्रबल अभिलाषा है कि उन्हें प्यारीजू (श्रीराधा) की वेणी गूंथने का सौभाग्य प्राप्त हो। श्री प्रिया जू का कथन है कि यह सेवा सखियों की है, किन्तु लाल बार बार मनुहार करते हुए प्रार्थना कर रहे हैं -
हे प्यारीजू! आपकी सौगंध खाकर कहता हूँ कि वेणी गूंथने की कला मुझसे अधिक कोई नहीं जानता। हे प्यारी! वेणी के बीच-बीच में सफेद, पीले एवं लाल फूलों की सज्जा मेरे सदृश दूसरा कोई नहीं बना सकता । [1]
श्रीप्रिया जू अंततः सहमत हो जाती हैं। श्रीलाल प्रसन्नता से भरकर वेणी गूंथने बैठते हैं और अपने कोमल करों की कंघी से केशों को सँवारते हैं। वेणी गूंथने के बाद, प्यारी रीझ जाती हैं और श्रीलाल को वस्त्राभूषण धारण कराने की अनुमति देती हैं। श्रीलाल उनका नख-शिख तक श्रृंगार करते हैं और अंत में अपने नख से ही नेत्रों में काजल भी लगाते हैं। [2]
बेंनी गूँथि कहा कोउ जानें मेरी सी तेरी सौं ।
बिच बिच फूल सेत पीत राते को करि सकै एरी सौं ॥ [1]
बैठे रसिक सँवारनि बारनि कोमल कर ककही सौं ।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा नखसिख लोँ बनाई दे काजर नख ही सौं ॥ [2]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (70)
आज श्रीलाल (श्रीकृष्ण) की प्रबल अभिलाषा है कि उन्हें प्यारीजू (श्रीराधा) की वेणी गूंथने का सौभाग्य प्राप्त हो। श्री प्रिया जू का कथन है कि यह सेवा सखियों की है, किन्तु लाल बार बार मनुहार करते हुए प्रार्थना कर रहे हैं -
हे प्यारीजू! आपकी सौगंध खाकर कहता हूँ कि वेणी गूंथने की कला मुझसे अधिक कोई नहीं जानता। हे प्यारी! वेणी के बीच-बीच में सफेद, पीले एवं लाल फूलों की सज्जा मेरे सदृश दूसरा कोई नहीं बना सकता । [1]
श्रीप्रिया जू अंततः सहमत हो जाती हैं। श्रीलाल प्रसन्नता से भरकर वेणी गूंथने बैठते हैं और अपने कोमल करों की कंघी से केशों को सँवारते हैं। वेणी गूंथने के बाद, प्यारी रीझ जाती हैं और श्रीलाल को वस्त्राभूषण धारण कराने की अनुमति देती हैं। श्रीलाल उनका नख-शिख तक श्रृंगार करते हैं और अंत में अपने नख से ही नेत्रों में काजल भी लगाते हैं। [2]

