(राग-मलार)
जो कोऊ वृन्दाविपिन बसै ।
जद्दपि पाप-पहार रह्यौ बढ़ि, तामें डोलत सहज नसै ॥ [1]
जिन अहि काल ग्रसे सुरपति से, ताहि न कबहूँ भूलि डसै।
दम्पति सम्पति धरि हृदै दिन, संतत आनँद माँहिं हँसै ॥ [2]
जिहिं भव-निधि में बूड़त उछरत, सो कबहूँ नहिं सुपन धसै।
'दामोदर हित' गुरु करुणा तें, गावै पावै रास रसै ॥ [3]
- श्री हित दामोदर दास, फुटकर वाणी (172)
जो कोई भी श्रीधाम वृन्दावन में वास करता है — चाहे उसके पाप पर्वत के समान भारी क्यों न हों, वृन्दावन के प्रभाव से वे सहज ही नष्ट हो जाते हैं । [1]
जो भयंकर काल रूपी सर्प, स्वर्ग के सम्राटों तक को निगल जाता है, वह भी वृन्दावनवासी भक्त को कभी नहीं डँसता। ऐसा भक्त अपने हृदय में नित्य युगल-सरूप की अनुपम छवि को धारण कर, सदा परम आनन्द में निमग्न रहता है। [2]
जो जीव अनादिकाल से संसार-सागर में डूबते चले आ रहे हैं, वृन्दावनवास उन्हें सहज ही उबार लेता है — यहाँ तक कि स्वप्न में भी डूबने नहीं देता। श्रीहित दामोदरदास जी कहते हैं कि जो वृन्दावन वास करते हुए, श्री राधा-कृष्ण के गुणों का गान करता है वे अंततः रास-रस की प्राप्ति करता है। [3]
जो कोऊ वृन्दाविपिन बसै ।
जद्दपि पाप-पहार रह्यौ बढ़ि, तामें डोलत सहज नसै ॥ [1]
जिन अहि काल ग्रसे सुरपति से, ताहि न कबहूँ भूलि डसै।
दम्पति सम्पति धरि हृदै दिन, संतत आनँद माँहिं हँसै ॥ [2]
जिहिं भव-निधि में बूड़त उछरत, सो कबहूँ नहिं सुपन धसै।
'दामोदर हित' गुरु करुणा तें, गावै पावै रास रसै ॥ [3]
- श्री हित दामोदर दास, फुटकर वाणी (172)
जो कोई भी श्रीधाम वृन्दावन में वास करता है — चाहे उसके पाप पर्वत के समान भारी क्यों न हों, वृन्दावन के प्रभाव से वे सहज ही नष्ट हो जाते हैं । [1]
जो भयंकर काल रूपी सर्प, स्वर्ग के सम्राटों तक को निगल जाता है, वह भी वृन्दावनवासी भक्त को कभी नहीं डँसता। ऐसा भक्त अपने हृदय में नित्य युगल-सरूप की अनुपम छवि को धारण कर, सदा परम आनन्द में निमग्न रहता है। [2]
जो जीव अनादिकाल से संसार-सागर में डूबते चले आ रहे हैं, वृन्दावनवास उन्हें सहज ही उबार लेता है — यहाँ तक कि स्वप्न में भी डूबने नहीं देता। श्रीहित दामोदरदास जी कहते हैं कि जो वृन्दावन वास करते हुए, श्री राधा-कृष्ण के गुणों का गान करता है वे अंततः रास-रस की प्राप्ति करता है। [3]

