(राग विहाग)
श्रीश्यामा मानो विनती मोरी ।
मैं निज दासी चरण उपासी, जन्म जन्म की तोरी ॥ [1]
मोसी तेरे अली अनेकन, मेरे तू एक गोरी।
करुणासागर गुनह माफ कर, सुनिये कुँवरि किशोरी ॥ [2]
परवस प्राण फस्यो नहिं निकसत, विरह करत बरजोरी ।
सरसमाधुरी की सुधि लीजे, नेक चितो मो ओरी ॥ [3]
- श्री सरस माधुरी
हे श्रीश्यामा! मेरी विनती स्वीकार कीजिए। मैं आपकी निज दासी हूँ, आपके चरणों की उपासिका हूँ। मैं जन्म-जन्म से केवल आपकी ही हूँ। [1]
आपकी सखियाँ तो अनेकों हैं, परंतु मेरे लिए तो केवल एक आप ही हैं। हे करुणा-सागर! हे गौरवर्ण किशोरी! मेरी भूल-चूक को क्षमा कर दीजिए। [2]
मेरे प्राण आपके विरह में ऐसे बंध चुके हैं कि अब वे निकल ही नहीं सकते। श्री सरस मधुरी कहते हैं — हे महारानी! मेरी सुधि लीजिए और अपनी कृपादृष्टि से मुझे कृतार्थ कीजिए। [3]
श्रीश्यामा मानो विनती मोरी ।
मैं निज दासी चरण उपासी, जन्म जन्म की तोरी ॥ [1]
मोसी तेरे अली अनेकन, मेरे तू एक गोरी।
करुणासागर गुनह माफ कर, सुनिये कुँवरि किशोरी ॥ [2]
परवस प्राण फस्यो नहिं निकसत, विरह करत बरजोरी ।
सरसमाधुरी की सुधि लीजे, नेक चितो मो ओरी ॥ [3]
- श्री सरस माधुरी
हे श्रीश्यामा! मेरी विनती स्वीकार कीजिए। मैं आपकी निज दासी हूँ, आपके चरणों की उपासिका हूँ। मैं जन्म-जन्म से केवल आपकी ही हूँ। [1]
आपकी सखियाँ तो अनेकों हैं, परंतु मेरे लिए तो केवल एक आप ही हैं। हे करुणा-सागर! हे गौरवर्ण किशोरी! मेरी भूल-चूक को क्षमा कर दीजिए। [2]
मेरे प्राण आपके विरह में ऐसे बंध चुके हैं कि अब वे निकल ही नहीं सकते। श्री सरस मधुरी कहते हैं — हे महारानी! मेरी सुधि लीजिए और अपनी कृपादृष्टि से मुझे कृतार्थ कीजिए। [3]

