कसूंबी सारी पहरें सोधें सनी - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (8)

कसूंबी सारी पहरें सोधें सनी - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (8)

कसूंबी सारी पहरें सोधें सनी।
मोहन मन मोहनी मोहन की, निसदिन रहत बनी॥ [1]
भृकुटी चांप मधि नैंन जुगल सर, काजर रेख अनी ।
करि आपुन आधीन रसिक चित, अन तिय कलह हनी ॥ [2]
राजत कुंज महल रस रानी, लालन गुननि भनी ।
जय श्री बंशी अलि की जीवन श्यामा, अविचल नाथ मनी ॥ [3]

- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (8)

श्री राधा कुसुंबी (गहरी लाल) रंग की साड़ी में, मोहन (श्री कृष्ण) के मन को भी मोहने वाली मोहिनी स्वरूपा, नित्य सुसज्जित हैं ।  [1]

उनकी कमान-सी भौंहें तनी हुई हैं, जिनके मध्य में युगल नयन बाण से सुशोभित हैं, जिनमें काजल की रेखाएँ अत्यंत मनोहर लगती हैं। रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर एवं समस्त रसिकों के चित्त को सदा अपने अधीन रखने वाली, अन्य स्त्रियों की कलह को निष्फल कर देती हैं। [2]

निकुंज-महल में विराजित, रस की अधिष्ठात्री, महारानी अनंत शोभा से विराजमान है। श्री कृष्ण सदा उनके गुणों का गान करते रहते हैं । श्री वंशी अलि कहते हैं —ऐसी श्यामा महारानी मेरे जीवन का प्राण, मेरी अविचल नाथ हैं । [3]