प्यारी देख मेरें कैसी वीरी रची - श्री रामराय जी, आदिवाणी (26)

प्यारी देख मेरें कैसी वीरी रची - श्री रामराय जी, आदिवाणी (26)

प्यारी देख मेरें कैसी वीरी रची।
तेरे अधरामृत कौ जह फल, अरुन में अरुन खची॥ [1]
दर्पन देखि रूप मोहि मेरौ, मोहिनि सांच जची ।
चर्वन रामराय को हूं दे, जाकों अधिक रुची॥ [2]

- श्री रामराय जी, आदिवाणी (26)

सखी श्री राधा से कहती है —
हे प्यारी जू! देखो, मैंने कितनी सुंदर बीरी (पान) रची है। इसका फल यह होगा कि तुम्हारे अमृत-से अधरों पर लालिमा और भी गाढ़ी हो जाएगी—अर्थात् तुम्हारे लाल होठों पर यह और गहरी रंजना कर देगी। [1]

दर्पण में तुम्हारा मुखारविंद निहार कर मेरा मन मोहित हो गया। सचमुच हे मोहिनी! तुम्हारी शोभा का वर्णन कर पाना असंभव है। अब कृपया इस बीरी का चर्वण कर उसका प्रसाद श्री रामराय को प्रदान करो—क्योंकि उन्हें तुम्हारे प्रसाद में विशेष रुचि है। [2]