सुनि परमित पिय प्रेम की, चातक चितवति पारि।
घन आशा सब दुख सहै, अंत न याँचै वारि॥
- श्री सूरदास, सूर सागर
प्रिय के असीम प्रेम को सुनकर चातक पक्षी सदा बादलों की ओर अनन्य भाव से निहारता है। उसी मेघ की आशा से सब दुख सहता है, परंतु मरते दम तक भी जल (वर्षा) के लिए यांचना नहीं करता। सच्चे प्रेमी का यही स्वभाव होता है कि वह अपने प्रियतम से कुछ भी माँगता नहीं।
घन आशा सब दुख सहै, अंत न याँचै वारि॥
- श्री सूरदास, सूर सागर
प्रिय के असीम प्रेम को सुनकर चातक पक्षी सदा बादलों की ओर अनन्य भाव से निहारता है। उसी मेघ की आशा से सब दुख सहता है, परंतु मरते दम तक भी जल (वर्षा) के लिए यांचना नहीं करता। सच्चे प्रेमी का यही स्वभाव होता है कि वह अपने प्रियतम से कुछ भी माँगता नहीं।

