गंगा, जमुना, सुरसती, सात सिन्धु भरपूर।
‘तुलसी’ चातक के मते, बिन स्वाति सब धूर॥
- श्री तुलसीदास
भले ही परम पवित्र नदियाँ जैसे गंगा, यमुना, सरस्वती और सातों समुद्र जल से भरे हों, परन्तु चातक पक्षी के लिए स्वाति नक्षत्र का जल छोड़कर बाकी सब जल धूल के समान है क्योंकि चातक अनन्य भाव से केवल स्वाति की बूँद की ही प्रतीक्षा करता है और उसी को ग्रहण करता है। भाव यह है कि चाहे संसार में कितनी ही महान विभूतियाँ क्यों न हों, परन्तु एक सच्चा प्रेमी अपने प्रियतम के अतिरिक्त किसी और को स्वीकार नहीं करता और न ही किसी अन्य से कुछ चाह रखता है।
‘तुलसी’ चातक के मते, बिन स्वाति सब धूर॥
- श्री तुलसीदास
भले ही परम पवित्र नदियाँ जैसे गंगा, यमुना, सरस्वती और सातों समुद्र जल से भरे हों, परन्तु चातक पक्षी के लिए स्वाति नक्षत्र का जल छोड़कर बाकी सब जल धूल के समान है क्योंकि चातक अनन्य भाव से केवल स्वाति की बूँद की ही प्रतीक्षा करता है और उसी को ग्रहण करता है। भाव यह है कि चाहे संसार में कितनी ही महान विभूतियाँ क्यों न हों, परन्तु एक सच्चा प्रेमी अपने प्रियतम के अतिरिक्त किसी और को स्वीकार नहीं करता और न ही किसी अन्य से कुछ चाह रखता है।

