अनन्यशरणो नित्यं तथैवानन्यसाधनः ।अनन्यसाधनार्थत्वात्स्यादनन्य प्रयोजनः॥
नान्यं च पूजयेद्देवं न नमेत्तं स्मरेन्न च । न च पश्येन्न गायेच्च न च निंदेत्कदाचन॥
नान्योच्छिष्टं च भुंजीत नान्यशेषं च धारयेत् । अवैष्णवानां संभाषा वंदनादि विवर्जयेत् ॥
आश्रित्य चातकीं वृत्तिं देहपातावधि द्विज। द्वयस्यार्थं भावयित्वा स्थेयमित्येव मे मतिः ॥
- पद्म पुराण (5.82.33 - 2.5.38)
भगवान शंकर नारद जी से अनन्य भक्ति के विषय में कहते हैं -
मनुष्य को सदैव केवल अपने उपास्य देव की ही अनन्य शरण लेनी चाहिए और किसी अन्य साधन को नहीं अपनाना चाहिए, क्योंकि अनन्य-भक्ति से ही जीव की जन्मों की बिगड़ी बात बनेगी । ऐसा भक्त अन्य देव की पूजा न करे, अन्य को प्रणाम न करे, न ही अन्य का स्मरण करे । वह न तो अन्य को देखे, न अन्य के यश गावे और न ही अन्य की कभी निन्दा करे, और न ही अन्य का प्रसाद ग्रहण करे, न ही अन्य की माला आदि धारण करे। अपने इष्टदेव के अतिरिक्त अन्य किसी का वार्तालाप, वंदन, या बाह्य व्यवहार को पूर्ण रूप से त्याग देना चाहिए । जैसे चातक पक्षी अत्यन्त प्यासा होने पर भी नदी या समुद्र का जल नहीं पीता और केवल स्वाति नक्षत्र की वर्षा-बून्द ही ग्रहण करता है, उसी प्रकार जीव को भी केवल अपने इष्टदेव की ही शरण में जाना चाहिए।
नान्यं च पूजयेद्देवं न नमेत्तं स्मरेन्न च । न च पश्येन्न गायेच्च न च निंदेत्कदाचन॥
नान्योच्छिष्टं च भुंजीत नान्यशेषं च धारयेत् । अवैष्णवानां संभाषा वंदनादि विवर्जयेत् ॥
आश्रित्य चातकीं वृत्तिं देहपातावधि द्विज। द्वयस्यार्थं भावयित्वा स्थेयमित्येव मे मतिः ॥
- पद्म पुराण (5.82.33 - 2.5.38)
भगवान शंकर नारद जी से अनन्य भक्ति के विषय में कहते हैं -
मनुष्य को सदैव केवल अपने उपास्य देव की ही अनन्य शरण लेनी चाहिए और किसी अन्य साधन को नहीं अपनाना चाहिए, क्योंकि अनन्य-भक्ति से ही जीव की जन्मों की बिगड़ी बात बनेगी । ऐसा भक्त अन्य देव की पूजा न करे, अन्य को प्रणाम न करे, न ही अन्य का स्मरण करे । वह न तो अन्य को देखे, न अन्य के यश गावे और न ही अन्य की कभी निन्दा करे, और न ही अन्य का प्रसाद ग्रहण करे, न ही अन्य की माला आदि धारण करे। अपने इष्टदेव के अतिरिक्त अन्य किसी का वार्तालाप, वंदन, या बाह्य व्यवहार को पूर्ण रूप से त्याग देना चाहिए । जैसे चातक पक्षी अत्यन्त प्यासा होने पर भी नदी या समुद्र का जल नहीं पीता और केवल स्वाति नक्षत्र की वर्षा-बून्द ही ग्रहण करता है, उसी प्रकार जीव को भी केवल अपने इष्टदेव की ही शरण में जाना चाहिए।

