झूलत फूलत कुंजविहारी -  श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (321)

झूलत फूलत कुंजविहारी - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (321)

(राग मलार)
झूलत फूलत कुंजविहारी।
दूसरी ओर किसोरवल्लभा श्रीवृषभान दुलारी॥ [1]
कुलकत हँसत खसत कुसुमावलि सुंदर झूमक सारी।
कबहुँक पटतरि झुलवति गावति प्यारिहि पिय रसिया री॥
देखति नैंन सफल करि खेलत, कोटि व्यास वलिहारी॥ [2]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (321)

निकुंज में कुंजविहारी झूला झूल रहे हैं एवं प्रफुल्लित हो रहे हैं, और दूसरी ओर किशोरवल्लभा, वृषभानु की दुलारी, श्री राधा महारानी विराजमान हैं। [1]

वे कुलकारी मारके हँस रही हैं। झूले से उनकी फूलों की मालाएँ गले से ढुलक रही हैं और साड़ी पवन में लहर रही है। कभी कोई सखी झुला रही है, कभी कोई — और सभी मिलकर प्रेम-रस में गीत गा रही हैं। युगल की इस झूला-लीला को निहारकर श्री हरिराम व्यास जी के नयन सफल हो रहे हैं, और वे स्वयं को बारंबार बलिहार रहे हैं। [2]