श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (26)

श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (26)

श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि ।
दंपति रति गति माधुरी, राखी नैंननि झेलि॥

- श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (26)

जो स्वामी हरिदास जी के अनन्य जन हैं, वे युगलवर, श्री श्यामा कुंज बिहारी के नित्य विहार रूपी रस-केलि में ही अपने मन को लगाते हैं तथा युगल किशोर दंपति की रूप-रस माधुरी का नित्य अपने नयनों से पान करते रहते हैं।