मेरी अँखियाँ राधा-रूप पगीं - श्री हित परमानंद दास जी

मेरी अँखियाँ राधा-रूप पगीं - श्री हित परमानंद दास जी

मेरी अँखियाँ राधा-रूप पगीं।
मृदु मुसिक्यानि बिकानी निसि-दिन, सोवति नाहिं जगीं॥ [1]
नैंन-सैंन रुख-सुख समझी हैं, एकहि ठौर लगीं।
राधाबल्लभ 'हित परमानँद', प्रेम-सुरग रँगीं॥ [2]

- श्री हित परमानंद दास जी

मेरी आँखें श्री राधा के दिव्य रूप में ऐसी रँगी हुई हैं कि उनकी मधुर मुस्कान में बिना मूल्य के बिक चुकी हैं। वे उनसे मोहित होकर दिन-रात जागती रहती हैं। [1]

अब वे श्री राधा के नेत्र-संकेतों को भलीभाँति पहचानने लगी हैं, इसीलिए उनकी दृष्टि पूर्णतः वहीं स्थिर है। श्री हित परमानंद कहते हैं — श्री राधा के नयनों में ऐसा प्रेम रंग भरा हुआ है कि मेरे नेत्र भी अब प्रेम में ही पूर्णतः रंग गए हैं । [2]