कुँवरि किसोरी नवल पिय, करत परस्पर हेत ।
तनिक मधुर मुसकाइकै, ‘ब्रजनिधि’ मन हरि लेत ॥
- श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, हरि पद संग्रह (45)
कुंवरी किशोरी श्री राधा और नवल रसिक श्री कृष्ण परस्पर प्रेम के बंधन में बँधे हैं। केवल थोड़ी-सी मुस्कान से ही वे मेरे मन को हर लेते हैं।
तनिक मधुर मुसकाइकै, ‘ब्रजनिधि’ मन हरि लेत ॥
- श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, हरि पद संग्रह (45)
कुंवरी किशोरी श्री राधा और नवल रसिक श्री कृष्ण परस्पर प्रेम के बंधन में बँधे हैं। केवल थोड़ी-सी मुस्कान से ही वे मेरे मन को हर लेते हैं।

