ऐसी को करिहै श्रीराधा - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (292)

ऐसी को करिहै श्रीराधा - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (292)

(राग ईमन)
ऐसी को करिहै श्रीराधा।
मेट्यो तिमिर हिये दासी को, कहत नाम निज आधा ॥ [1]
‘ललितकिशोरी’ चरन उपासन, जो काहू दृढ़ साधा।
निश्चै जुगुल प्रकासैं ता उर, मिटै त्रिविध जगवाधा ॥ [2]

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (292)

हे श्रीराधे! इस पूरे ब्रह्मांड में ऐसी परम कृपालुता से युक्त कौन हो सकता है, जो अपने नाम के केवल ‘रा’ अक्षर के उच्चारण मात्र से अपनी शरणागत दासी के हृदय का अंधकार मिटा दे। [1]

श्री ललित किशोरी कहती हैं कि जो दृढ़ता पूर्वक श्री राधा महारानी के चरणों की उपासना करता है, उसके हृदय में निश्चित ही युगल रस का प्रकाश होता है और समस्त जगत की बाधाएँ एवं त्रिताप (दैहिक, दैविक, भौतिक) नष्ट हो जाते हैं।