(सवैया)
ऐसे नहीं हम चाहन हार, जो आज तुम्हें कल और को चाहैं।
फ़ेंक दें आँखें निकारि दोऊ, यदि दूसरी ओर करैं ये निगाहें॥ [1]
लाख मिलैं तुमते बढ़ के, तुम्हीं को चहैं तुमहीं को सराहैं।
जौंलौं यह जीव रहे तन में, तौलौं हम नेह को नाता निबाहैं॥ [2]
- ब्रज के सवैया
हे श्री राधा-कृष्ण! हम ऐसे प्रेमी नहीं जो आज तुम्हें चाहें और कल किसी और को चाहने लगें। यदि हमारी ये आँखें तुम्हें छोड़कर किसी और की ओर देखें तो हम उन्हें निकालकर फेंक देंगे। [1]
चाहे तुमसे बढ़कर लाख मिलें, फिर भी हम केवल तुम्हीं को चाहेंगे और तुम्हीं के गुण गायेंगे। जब तक इस देह में प्राण है, तब तक हम इसी प्रेम-बंधन को निभाते रहेंगे। [2]
ऐसे नहीं हम चाहन हार, जो आज तुम्हें कल और को चाहैं।
फ़ेंक दें आँखें निकारि दोऊ, यदि दूसरी ओर करैं ये निगाहें॥ [1]
लाख मिलैं तुमते बढ़ के, तुम्हीं को चहैं तुमहीं को सराहैं।
जौंलौं यह जीव रहे तन में, तौलौं हम नेह को नाता निबाहैं॥ [2]
- ब्रज के सवैया
हे श्री राधा-कृष्ण! हम ऐसे प्रेमी नहीं जो आज तुम्हें चाहें और कल किसी और को चाहने लगें। यदि हमारी ये आँखें तुम्हें छोड़कर किसी और की ओर देखें तो हम उन्हें निकालकर फेंक देंगे। [1]
चाहे तुमसे बढ़कर लाख मिलें, फिर भी हम केवल तुम्हीं को चाहेंगे और तुम्हीं के गुण गायेंगे। जब तक इस देह में प्राण है, तब तक हम इसी प्रेम-बंधन को निभाते रहेंगे। [2]

