डोल झूलें स्यामा स्याम सहेली  - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (16)

डोल झूलें स्यामा स्याम सहेली - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (16)

(राग सारंग)
डोल झूलें स्यामा-स्याम सहेली ।
नव निकुञ्ज, नव रंग पिया-सँग,
बिहरत गर्व-गहेली ॥ [1]
कबहुँक प्रीतम रमकि झुलावत,
कब हूँ प्रिया नवेली ।
श्रीबीठलविपुल पुलकि ललितादिक,
देखत आनंद-केली ॥ [2]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (16)

हे सखी ! दिव्य दंपति श्री श्यामा श्याम  डोल झूल रहे हैं। नव-निकुंज मन्दिर में नवरंगी प्रियतम के संग गर्वोन्मत्त गर्वीली प्रिया विहार कर रही हैं। [1]

कभी प्रियतम उल्लसित होकर प्रिया को झुलाते हैं और कभी नवेली प्रियाजू प्रियतम को। श्रीललितादिक सखीगण इस निकुंज केलि-क्रीड़ा का अवलोकन करके पुलकित हो रही हैं। [2]