जो मारग खोजत फिरत, अजहूँ शेष महेश ।
सो दुर्लभ भूतल कियौ, जै जै रसिक नरेश ॥
- चाचा वृन्दावनदासजी, रसिक अनन्य परचावली (32)
जिस वृन्दावन-रस रूपी मार्ग को ब्रह्मा, शेष, शिव आदि भी खोजते फिरते हैं, उसी अद्भुत मार्ग को आपने इस पृथ्वी पर दुर्लभ से सुलभ बना दिया। हे रसिक-शिरोमणि, श्रीहित हरिवंश महाप्रभु! आपकी जय हो।
सो दुर्लभ भूतल कियौ, जै जै रसिक नरेश ॥
- चाचा वृन्दावनदासजी, रसिक अनन्य परचावली (32)
जिस वृन्दावन-रस रूपी मार्ग को ब्रह्मा, शेष, शिव आदि भी खोजते फिरते हैं, उसी अद्भुत मार्ग को आपने इस पृथ्वी पर दुर्लभ से सुलभ बना दिया। हे रसिक-शिरोमणि, श्रीहित हरिवंश महाप्रभु! आपकी जय हो।

