(दोहा)
सफल मनोरथ होत सब, आवत हियें जितेक ।
मेरे नैननि को अरी, यह अहार हैं एक ॥
(पद)
अरी मेरे नैननि को आहार ।
कल न परै पल एक बिना मोहिं अवलोकें सुखसार॥ [1]
सकल मनोरथ सफल होत तब करत हियें संचार ।
श्री हरिप्रिया प्रान-जीवन-धन कौ यह सुरत बिहार ॥ [2]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (37)
(दोहा)
श्री हरिप्रिया सखी कहती हैं—हे सखि! मेरे नयनों का एकमात्र आहार यही है कि सुरति-केलि में आरूढ़ प्रिया-प्रियतम का मैं सदा दर्शन करती रहूँ। उनके दर्शन से मेरे हृदय के समस्त मनोरथ सफल हो जाते हैं।
(पद)
हे सखि! मेरे नेत्रों का एकमात्र आहार यही है। सुख-सारस्वरूप प्रिया-प्रीतम के विहार-दर्शन बिना मुझे एक क्षण भी चैन नहीं पड़ता। [1]
जब इस विहार की छवि-माधुरी मेरे हृदय में प्रवाहित होती है, तभी मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। श्रीहरिप्रिया जी कहती हैं — रसिक दम्पती का यह सुरति-विहार ही मेरे प्राणों का जीवन-धन है। [2]
सफल मनोरथ होत सब, आवत हियें जितेक ।
मेरे नैननि को अरी, यह अहार हैं एक ॥
(पद)
अरी मेरे नैननि को आहार ।
कल न परै पल एक बिना मोहिं अवलोकें सुखसार॥ [1]
सकल मनोरथ सफल होत तब करत हियें संचार ।
श्री हरिप्रिया प्रान-जीवन-धन कौ यह सुरत बिहार ॥ [2]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सुरत सुख (37)
(दोहा)
श्री हरिप्रिया सखी कहती हैं—हे सखि! मेरे नयनों का एकमात्र आहार यही है कि सुरति-केलि में आरूढ़ प्रिया-प्रियतम का मैं सदा दर्शन करती रहूँ। उनके दर्शन से मेरे हृदय के समस्त मनोरथ सफल हो जाते हैं।
(पद)
हे सखि! मेरे नेत्रों का एकमात्र आहार यही है। सुख-सारस्वरूप प्रिया-प्रीतम के विहार-दर्शन बिना मुझे एक क्षण भी चैन नहीं पड़ता। [1]
जब इस विहार की छवि-माधुरी मेरे हृदय में प्रवाहित होती है, तभी मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। श्रीहरिप्रिया जी कहती हैं — रसिक दम्पती का यह सुरति-विहार ही मेरे प्राणों का जीवन-धन है। [2]

